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वे जो देश छोड़ समुद्र पार चले गए

चंद्रभूषण  

इक्कीसवीं सदी की सबसे अच्छी बातों में एक यह है कि इसने बाहर रह रहे भारतीयों को एक चेहरा दिया है. लेकिन जो मुश्किलें अभी इस चेहरे के साथ जुड़ी हैं, उन पर बात होनी चाहिए. भारत से बाहर करीब तीन करोड़ 10 लाख हिंदुस्तानी रहते हैं. अपने मूल देश के साथ इन सबका जुड़ाव एक-सा नहीं है. कोई यहीं जन्मा है तो किसी के सात-आठ पीढ़ी पुराने पूर्वज यहां से गए थे. यह जरूर है कि ये सारे लोग किसी न किसी रूप में भारत से अपना रिश्ता महसूस करते हैं और इसके साथ अपनी पहचान जोड़ते हैं. प्रवासियों की संख्या के मामले में भारत का मुकाबला सिर्फ चीन कर सकता है, जहां से निकले पांच करोड़ लोग पूरी दुनिया में फैले हुए हैं.
 
भारतीय और चीनी प्रवासियों के बीच तुलना करें तो चीनी अगर ताइवान या सिंगापुर या थाईलैंड से जाकर भी पेरू या ब्राजील में रह रहे हों तो वे खुद को चीनी मूल का ही बताते हैं और वहां के लोग भी उन्हें चीनी मानते हैं. लेकिन आजादी के पहले से पूर्वी अफ्रीकी देशों केन्या या तंजानिया में बसे भारतीयों में हिंदुओं की पहचान भारतीय और मुसलमानों की पाकिस्तानी बताई जाती है, भले ही उनकी जड़ें छत्तीसगढ़ या कर्नाटक से क्यों न जुड़ी हों. इसकी वजह साफ है कि भारत को आजादी धार्मिक आधार पर हुए विभाजन के साथ जुड़कर मिली, जिससे बाहर रह रहे लोगों में व्यर्थ का कन्फ्यूजन पैदा हुआ. लेकिन इसकी कुछ ज्यादा जटिल वजहें भी हैं.
 
एक समस्या भारतीयता की अंतर्वस्तु से भी जुड़ी है. भूगोल के अलावा इसका मतलब क्या है? चीनियों के लिए इसके कुछ ठोस अर्थ हैं. सबसे बढ़कर चीनी भाषा. वे चाहे चीन में पैदा होकर बाहर गए हों, या दस पीढ़ी पहले चीन से अलग हुए हों, चीनी भाषा की कामचलाऊ जानकारी उनके पास होती ही है. किसी भी चीनी से मिलने पर वे उसके साथ इसी भाषा में बात करते हैं. इसका कारण यह है कि चीन में एक भाषा की नीति दो हजार साल से जारी है.इसका अर्थ यह नहीं कि चीन में दूसरी पहचानों का अभाव है. बोलियों और जातीयता के आधार पर उनमें जबर्दस्त गुटबाजी देखी जाती है. हान, तिब्बतन और उइगुर जैसी जातीय पहचानों के अलावा हक्का, कैंटनीज और मैंडरिन जैसी बोलियों-शैलियों के आपसी झगड़े भी देखे जाते हैं. लेकिन भाषा की एकता उन्हें हर जगह चीनी बनाए रखती है.
 
भारतीय प्रवासियों के साथ न तो ऐसा कुछ है, न होने की दूर-दूर तक कोई संभावना है. अमेरिका में भी हर इलाके में आपको तेलुगू और गुजराती ही नहीं, भोजपुरी, कुमाऊंनी और मारवाड़ी संगठन भी फलते-फूलते और एक-दूसरे की जड़ें खोदते दिख जाते हैं. इसके अलावा भारतीयों और चीनियों के प्रवासी होने की प्रक्रिया भी अलग-अलग रही है. कई इलाकों पर विदेशी कब्जे के बावजूद केंद्रीय सत्ता के स्तर पर चीन को कभी गुलामी नहीं झेलनी पड़ी, जबकि भारत में केंद्रीय सत्ता जैसा कभी कुछ बना ही नहीं, और जो बना भी वह छीजते-कटते हुए 1857 में अंग्रेजी राज के हवाले हो गया. इस तरह भारतीय और चीनी प्रवास में सबसे बड़ा फर्क मर्जी और बिना मर्जी का है.
 
ब्रिटिश साम्राज्य में दास प्रथा का खात्मा 1838 में हुआ. तब से लेकर 1917 तक अंग्रेज न सिर्फ खुद नाम मात्र का एक बॉन्ड भराकर भारतीयों को दूर-दूर की जगहों पर दासों की तरह खटाने ले गए, बल्कि अन्य यूरोपीय देशों को भी ऐसा करने का मौका दिया. पूरा करीबियन इलाका, मॉरिशस और फिजी इसी प्रक्रिया में आधुनिक सभ्यता का अंग बने. भारतीयों के विदेशों में बसने की तीन बड़ी लहरें मानी जाती हैं. 1870 से 1910 के बीच, फिर द्वितीय विश्वयुद्ध के तुरंत बाद से लेकर 1995 तक, और तब से लेकर अभी तक भूमण्डलीकरण के प्रभाव में. इस क्रम में प्रवासी भारतीयों के बीच एक नए तरह की जातिप्रथा भी उभर आई है.
 
अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के अमीर भारतीय व्यापारी और प्रफेशनल अंग्रेजी और थोड़ी-बहुत पंजाबी-गुजराती बोलते हैं. वेस्ट इंडीज, मॉरिशस और फिजी के ऐली-गैली बोलने वालों का उनके लिए जैसे कोई वजूद ही नहीं है.जिंदगी से जुड़ी मजबूरियां इन भारतवंशियों को सौ साल से संजोकर रखी हुई अपनी संस्कृति छोड़ने को बाध्य कर रही हैं. उनके गीत अब भोजपुरी के बजाय अंग्रेजी में आने लगे हैं और सिर्फ एक पीढ़ी के अंदर हारमोनियम-ढोलक-धन्ताल छोड़कर ये डिस्को से होते हुए नीरस पश्चिमी बाजों में ढलने लगे हैं. इक्कीसवीं सदी ने भारतीय डायस्पोरा को एक चेहरा जरूर दिया है, पर भारत की ओर से उनके जीवन की समझ बनाकर मदद का जो हाथ बढ़ना चाहिए, वह लापता है.
 
फुलौरी के जरिये चटनी की याद
 
कंचन का गाया और बाबला के संगीत में ढला गाना ‘फुलौरी बिना चटनी कइसे बनी हमें 1980 के आस-पास सुनने को मिला था. वे भारत में कैसेट क्रांति के शुरुआती दिन थे और सुनने वाले जानते हैं कि इस एलबम ने उन दिनों देश के गली-मोहल्लों में कैसी क्रांति को अंजाम दिया था. बाबला गुजराती पृष्ठभूमि की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के छोटे भाई थे. जाहिर है, दोनों की संगीत शैली में ज्यादा फर्क नहीं था. लेकिन बाबला ने अपने चटनी संगीत के लिए सुदूर करीबियन इलाके में हाथ मारकर उस समय अचानक सारा ही खेल ही बदल दिया था.
 
‘फुलौरी बिना चटनी’ के बोल बहुत कम श्रोताओं की समझ में आए थे, लिहाजा इस गीत की कुछ लाइनें यहां देना जरूरी है, ताकि गाने में जाहिर होने वाले समाज का जायजा लिया जा सके. गीत का पहला ही अंतरा है- ‘आय वेंट सांग्रे ग्रांदे टु मीट लालबिहारी/ आय पुल आउट माय चौधारी ऐंड टेक आउट तेधारी...मी ऐंड माय डार्लिंग वाज फ्लाइंग इन अ प्लेन/ द प्लेन कैच अ फायर ऐंड वी फाल इनसाइड द केन.’ इस गीत के कई शब्दों का मतलब समझ में नहीं आता. सुनने में ‘माय’ का उच्चारण अमेरिकी अश्वेत आबादी की तरह ‘मेह’ है. लेकिन असल चीज है गाने का माहौल.
 
छुप-छुप कर मिल रहे प्रेमी-प्रेमिका का अचानक हवाई जहाज पर पहुंच जाना, जहाज का आग पकड़ लेना और जलते जहाज से हमारे इस प्रिय जोड़े का सीधे गन्ने के खेत में जा पड़ना! यह अंग्रेजी में गाई जा रही भोजपुरी है, जिसे अटलांटिक के पश्चिमी छोर पर वेस्ट इंडीज कहलाने वाले इलाके के सारे देशों ट्रिनिडाड-टोबैगो, सूरीनाम, जमैका और गुयाना में करीबियन हिंदुस्तानी या ‘ऐली-गैली’ के नाम से भी जानते हैं. और इस गीत के मूल गायक तथा रचनाकार हैं ट्रिनिडाड एंड टोबैगो के सुंदर पोपो बहोरा, जिन्हें न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में चटनी संगीत का भीष्म पितामह माना जाता है.
 
कहना न होगा कि अपने इस गाने के जरिये उन्होंने दुनिया भर के भारतवंशियों को एक सूत्र में बांध दिया था. आज भी न सिर्फ पश्चिमी अटलांटिक तट के करीबियन देशों में, बल्कि दक्षिणी हिंद महासागर के मॉरिशस और रियूनियन में और पूर्वी प्रशांत महासागर के फिजी में हो रही किसी भी हिंदुस्तानी शादी में बजने वाले गाने चटनी संगीत के ही दायरे में आते हैं और उन पर सुंदर पोपो बहोरा (4 नवंबर 1943-2 मई 2000) का कुछ न कुछ प्रभाव जरूर देखा जाता है.
 
करीबियन संगीत का ही एक और माहौल हमें ट्रिनिडाड एंड टोबैगो से भी जरा पश्चिम के देश सूरीनाम में देखने को मिलता है, जहां अंग्रेजी नहीं बोली जाती. कुछ समय पहले तक यह मुल्क हॉलैंड यानी नीदरलैंड्स का उपनिवेश हुआ करता था और आज भी इसकी सरकारी जुबान डच है. इसका फायदा यह हुआ है कि यहां का समाज अमेरिका के सांस्कृतिक सम्मोहन से बच गया और इसके गीतों में भोजपुरी का ठेठपन अपेक्षाकृत ज्यादा समय तक जिंदा रह गया.
 
यहां सुंदर पोपो बहोरा के समानांतर सूरीनामी गायक रामदेव चैतू (6 दिसंबर 1942-6 जून 1994) का जादू देखिए. यह गीत भी शायद आपने बहुत पहले कंचन की आवाज़ और बावला के संगीत में सुन रखा हो, पर उसे भूल जाइए. मूल सुनिए और अंतर्वस्तु पर सोचिए- 
'राते सपना दिखाय पिया हमको/ रात सपना
ना मोरे अंगने में निबिया के पेड़वा
जेकरी छइयां बिठाय पिया हमको/ रात सपना
ना मोरे नइहर में भइया-भतीजा
जेकरी आसा धराय पिया हमको/ रात सपना
ना मोरे ससुरे में लहुरा देवरवा
जेकर बहियाँ पकड़ाय पिया हमको/ रात सपना'
 
हारमोनियम, ढोलक और बैंजो पर गाए इस गाने में जो कसक है सो तो है ही. मैं इसे सुन-सुनकर गुनता रहा हूं कि यह गीत किस मनःस्थिति को व्यक्त करता है? कैसे चरित्र को इसमें उकेरा गया है? इसका कुछ अंदाजा मुझे सूरीनाम के पड़ोसी मुल्क ब्रिटिश गुयाना में पैदा होकर 6 साल की उम्र में अमेरिका के न्यू जर्सी में जा बसी 43 वर्षीय नामी पत्रकार गायुत्रा बहादुर की अभी दो साल पहले 2016 में आई बहुचर्चित किताब ‘कुली वुमन : द ओडिसी ऑफ इंडेंचर’ पढ़ कर लगा, जो दरअसल अद्भुत पत्राकारीय कौशल और संवेदना के साथ लिखी हुई उनकी परनानी की जीवनी है.
 
जैसे हमारे वे कभी थे ही नहीं
 
पता चला, 1903 में कलकत्ता से छूटे क्लाइड जहाज से जुड़े रिकॉर्ड में गायुत्रा की परनानी की पहचान इस रूप में दर्ज थी. नाम-सुजरिया, ऊंची जात, बाएं पैर पर दागे हुए का निशान, चार महीने की गर्भवती, साथ में कोई मर्द नहीं. बाद में इतना और पता चला कि वे बिहार की रहने वाली थीं और जाति से ब्राह्मण थीं. बतौर भारतवासी, हम आसानी से यह जान सकते हैं कि यह पहचान कितने विरोधाभासों से भरी है. गायुत्रा लाख कोशिशों के बाद भी यह नहीं पता कर सकीं कि उनकी परनानी विवाहित थीं या अविवाहित. या फिर उनका संबंध कहीं वेश्यावृत्ति से तो नहीं था.
 
चार महीने की गर्भवती स्त्री के लिए पानी के जहाज से परदेस जाना भी खुद में बहुत कड़े कलेजे का काम था. जरा सोचिए, पेट से चल रही अकेली सुजरिया के तन-मन पर वह कैसा दारुण बोझ रहा होगा, जिससे मुक्ति की चाहत ने उस जमाने की सी-सिकनेस को भी पछाड़ दिया, जिसके प्रभाव में एक से एक हैकड़ जवाँमर्द भी उल्टियां करते-करते अधमरे हो जाया करते थे! बहरहाल, तीन महीने का सफर करके सुजरिया गुयाना की राजधानी जॉर्जटाउन पहुंचीं, जहां पहुंचते ही उन्हें सतमासा बच्चा हुआ.
 
उनके शरीर का हाल देखते हुए उन्हें किसी अंग्रेज ओवरसियर का बच्चा देखने का काम मिला, जो उन्होंने कुछ समय तक किया, लेकिन फिर न सिर्फ वहां से बल्कि जॉर्जटाउन से ही भाग छूटीं. कुछ दिन भटकने के बाद वे शहर से दूर किसी गांव में दूध बेचने का काम करने वाले एक आदमी के साथ रहने लगीं, जहां से उस वंश की शुरुआत हुई, जिससे गायुत्रा बहादुर का संबंध है. यह चीज किसी और समाज में उन्हें तलछट बना देने के लिए काफी थी, लेकिन गायुत्रा बहादुर की मां और मौसियों का कहना है कि उनकी नानी सुजरिया की हैसियत अपने जमाने में फिल्मी सितारों जैसी हुआ करती थी! लोग उनके 'विचलन' से नहीं, संघर्ष से प्रभावित थे.
 
गायुत्रा बहादुर अपनी परनानी की कहानी में बताती हैं कि सुदूर इलाकों में जाने वाले इंडेंचर जहाजों में स्त्रियों को ले जाने पर खासा जोर रहता था और इसके लिए कोई शर्त नहीं रखी जाती थी. इसका दूसरा पहलू यह था कि जहाजों पर जाने वाली स्त्रियों में दो तिहाई ऐसी हुआ करती थीं, जिनके साथ कोई पुरुष नहीं होता था. ले जाए गए लोगों की यात्रा के दौरान मृत्यु का रिकॉर्ड 1854 से 1864 के बीच 8.54 प्रतिशत दर्ज है. यानी 10 हजार में 854 रास्ते मे ही साफ हो जाते थे. स्त्रियां जितनी स्वाभाविक मृत्यु से मरती थीं, उसके आसपास ही मामले उनकी हत्या कर दिए जाने के भी हुआ करते थे.
 
इंडेंचर प्रथा या गिरमिटिया व्यवस्था ब्रिटिश शासन में गुलामी को प्रतिबंधित कर दिए जाने के 80 साल बाद तक नए इलाकों में खेती करने वाले बागान मालिकों और बड़े ब्रिटिश खेतिहरों को सस्ता श्रम मुहैया कराने का सफल तरीका बनी रही. इसके तहत 10 लाख से ज्यादा मजदूर भारत से वेस्ट इंडीज ले जाए गए. ठोस तौर पर कहें तो जमैका, ब्रिटिश गुयाना, सूरीनाम और ट्रिनिडाड एंड टोबैगो. गायुत्रा बहादुर की खासियत यह है कि अपनी किताब में उन्होंने इंडेंचर के गुलामी से समानता और भिन्नता, दोनों दिखाने वाले पहलुओं को पकड़ा है.
 
इसमें कोई शक नहीं कि जिन भारतीय स्त्रियों को जहाजों पर तीन महीने का सफर करके वेस्ट इंडीज जाना पड़ा, उनके हिस्से जीवन के अथाह कष्ट आए. लेकिन वहां पहुंचकर जो जीवन उन्हें जीने को मिला, वह कई मामलों में भारत में रह कर जिए जाने वाले कलंकित, बहिष्कृत जीवन से कहीं बेहतर था. किताब से हटकर बात करें तो ब्रिटिश गुयाना के पड़ोसी मुल्क ट्रिनिडाड एंड टोबैगो के बहुचर्चित गायक और गीतकार सुंदर पोपो बहोरा ने ‘नाना और नानी’ शीर्षक वाले गीत में एक अजब, अद्भुत माहौल खींचा है. इसका एक अंतरा देखें-
 
‘आगा-आगा नाना चले नानी गोइंग बिहाइंड
नाना ड्रिंकिंग वाइट रम ऐंड नानी ड्रिंकिंग वाइन
नाना राइडिंग बाइसिकल ऐंड नानी रिंगिंग बेल
नानी लॉक द हैंडल दे फाल इनसाइड अ: वेल’
 
लाल पसीने की लयकारी
 
कहना जरूरी है कि गायुत्रा बहादुर जिस ब्रिटिश गुयाना से आई हैं, वह एक अंग्रेजीभाषी देश है और वहां से अमेरिका की ओर पलायन अभी समूचे वेस्ट इंडीज में सबसे ज्यादा है. भोजपुरी और हिंदी के विलोप की आशंका भी यहीं सबसे पहले और सबसे अधिक है. बगल में जिस गैर-अंग्रेजी, डचभाषी सूरीनाम की समृद्ध भोजपुरी परंपरा हमें चौथाई सदी पहले दिवंगत रामदेव चैतू में दिखाई देती है, उसका हाल भी कुछ ठीक नहीं है. पिछले चालीस वर्षों में पढ़े-लिखे भोजपुरी भाषियों का सूरीनाम से हॉलैंड की ओर तेजी से पलायन हुआ है. और अभी उनकी कोई डेढ़ लाख आबादी हॉलैंड में ही निवास करती है. इससे एक विचित्र किस्म की संस्कृति का सृजन हो रहा है, जो एकबारगी किसी आम भारतवासी के मन-मस्तिष्क पर मुश्किल से ही चढ़ सकती है.
 
यह चीज है यूरोपीय कुलीनता वाली एक बहुत ही नफीस किस्म की भोजपुरी संस्कृति, जिसमें दुख कुछ ज्यादा ही छायावादी हो जाता है. अगर आप इसका नमूना देखना चाहते हैं तो बाख और बीथोवन की परंपरा वाले डच संगीत में उकेरी हुई राजमोहन की गाई और उन्हीं की लिखी हुई भोजपुरी गजलें सुनिए. इनमें सबसे चर्चित उनकी 'दुई मुट्ठी' शीर्षक वाली गजल है, जिसमें भारतीय प्रवासियों के सूरीनाम पहुंचने के 140 वर्ष पूरे होने पर उनकी अथाह पीड़ा का वर्णन किया गया है. लेकिन गजल सुनने पर इसका मैनरिज्म ही दिमाग पर हावी होता है, इसके शब्द कहीं दूर बिसर जाते हैं और पीड़ा का ज्यादा हिस्सा गायक तक ही सिमट जाता है. तमाम तरक्की के बावजूद इस नफीस गजल में- मेरे ख्याल से- वेस्ट इंडियन भारतीय संस्कृति का संकट ही जाहिर होता है.
 
अफसोस इस बात से होता है कि अभी तो हमने अपने इन बिछड़े हुए परिजनों से मिलना शुरू किया था, और अभी किस्सा खत्म भी होना शुरू हो गया. अब से तीस-चालीस साल पहले वेस्ट इंडीज अथवा करीबियन इलाके के भारतवंशियों ने भारतीय संस्कृति के नक्शे पर अपनी कैसी गहरी छाप छोड़ी थी. लेकिन नब्बे के दशक से ग्लोबलाइजेशन के जोर और भारत पर बढ़े एनआरआई प्रभाव ने उन्हें अचानक हमसे दूर कर दिया. 1980 में आया ‘फुलौरी बिना चटनी’ दरअसल भारत पर भारतवंशी सांस्कृतिक प्रभाव का एक सुंदर नमूना था. लेकिन यह प्रभाव उस समय साहित्य के दायरे में और भी ज्यादा देखा जा रहा था, जहां मॉरिशस के उपन्यासकार अभिमन्यु अनत के उपन्यास हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में धारावाहिक छप रहे थे.
 
यह चीज आम हिंदुस्तानी के दिल के इतने करीब थी कि ‘लाल पसीना’ कई लोगों को किसी भारतीय कथाकार की ही रचना लगती थी. मैंने इसे पढ़ना शुरू किया तो बीच-बीच में हैरान हो जाता था. भाषा लगभग वैसी ही थी, जैसी हम लिखते-बोलते हैं. लेकिन माहौल अलग था और संबंधों का स्वरूप समझने में अड़चन आती थी. ऐसी अड़चन उस समय टॉल्स्टॉय और दोस्तोएव्स्की के अनुवाद पढ़ने में भी आती थी, पर उसे हम विदेशी माहौल की बातें मानकर दरकिनार करते चलते थे. यहां मामला अलग था.
 
अपनी जमीन से हजारों मील दूर एक अनजाने इलाके में फंसे कुंदन सिपाही और उसके साथियों की संघर्ष गाथा पढ़ते हुए आप एक गंवई माहौल में पहुंचे हुए हैं, जहां तीखी धूप में स्कर्ट पहने गन्ना काट रही मां अपने बेटे को 'तीन बुतिकिया बजार' (फ्रेंच में बुतिक यानी दुकान) से लेमनेड की दो बोतलें पकड़ लाने को बोल रही है! यह बात समझने के लिए अपनी नजर हिंद महासागर के पार ले जाने की क्षमता मुझमें होनी चाहिए थी, जो नहीं थी. हमारी समस्या यही है कि अंग्रेजीदां प्रवासी भारतीयों को हम चापलूसी की हद तक अपने दिल के करीब मान लेते हैं, उनकी कही हर बात को समझने के लिए दोहरे हुए जाते हैं और उसे वेदवाक्य की तरह छापते हैं. लेकिन मामला जब हाल तक भोजपुरी और दीगर देसी जुबानें बोलने वाले भारतवंशियों का आता है तो भरपूर संवेदना के साथ उनकी जटिल सभ्यता की बारीकियों में गए बगैर उन्हें अपने ही विस्तार की तरह देखना चाहते हैं.
 
उनकी लिपि और व्याकरण की समस्या, उनके दुख-सुख, उनके संघर्ष, को जानने के ईमानदार जतन हमारी तरफ से बिल्कुल नहीं हो पाते. कई दूसरी भाषाओं के शब्दों के घालमेल के बावजूद वे काफी हद तक हमारी ही जुबान बोलते हैं. लेकिन बात जब उनकी जुबान समझने की आती है तो हम शुद्धतावादी हो जाते हैं. याद रहे, संस्कृति का सौदा कभी एकतरफा नहीं होता. अगर हम भारतवंशियों के भाषिक प्रयोगों, उनकी जिंदगी की स्वतंत्र लयकारी को खुले मन से जानने-समझने की कोशिश करें तो इससे न सिर्फ हमारी भाषा-संस्कृति का विस्तार होगा, बल्कि हमारे भीतर कुछ बड़प्पन भी आएगा, जिसकी जरूरत आज हमें बहुत ज्यादा है.
(विश्व हिंदी सम्मेलन (मॉरिशस, 2018) की  स्मारिका में प्रकाशित नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण का शोध-लेख)
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