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यह दौर बिना सिर पैर की ख़बरों का भी है

संजय कुमार सिंह 

अजहर मसूद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने की भारत और भारत के समर्थन में दुनिया के कई अन्य देशों की कोशिश नाकाम रही है. चीन को इस मामले में वीटो करने का अधिकार है और वह पहले भी रोड़े अटका चुका है. यह अलग बात है कि तब यह खबर इतनी महत्वपूर्ण नहीं होती थी. पठानकोट हमले के बाद, अप्रैल 2016 में चीन ने ऐसा ही किया था. उस समय भारत ने इसका विरोध किया था और कहा था कि तकनीकी आधार पर ऐसा कदम समझ से बाहर है. कल की बैठक के बाद भारत ने आधिकारिक तौर पर यही कहा है कि वह इस नतीजे से निराश है. यह सब कल के अखबारों में छप चुका है. फिर भी आज के अखबारों में मसूद पर सियासी महाभारत (हिन्दुस्तान) और मसूद पर चीन के खिलाफ बाइपास बनाएंगे देश (नवभारत टाइम्स) जैसी सुर्खियां हैं. 
नवोदय टाइम्स ने मसूद पर अब और विकल्पों की तलाश जैसा शीर्षक लगाया है जबकि चीन ने कहा है कि उसका फैसला नियमों के अनुसार है और यह उम्मीद है कि समिति के प्रासंगिक कदम से संबंधित देशों को वार्ता एवं विचार विमर्श में मदद मिलेगी. क्षेत्रीय शांति व अस्थिरता के लिए और जटिलता पैदा नहीं होगी. चीन ने वैसे भी यही कहा है कि उसे मामले के अध्ययन के लिए समय चाहिए. ऐसे में यह मामला इतना महत्वपूर्ण नहीं कि देश दुनिया के दूसरे सभी मुद्दे छोड़ दिए जाएं. खासकर इसलिए भी कि वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिए जाने से भी अचानक कुछ खास नहीं होने वाला है. ऐसा नहीं है कि इतने भर से आतंकवाद रुक जाएगा. सारी दुनिया में या भारत में. 
असल में इस मामले में राहुल गांधी की टिप्पणी कड़वी, राजनीतिक और सरकार के खिलाफ है. सरकारी स्तर पर इसका कोई जवाब भी नहीं हो सकता है. ऐसे में जो कहा गया है वह पार्टी के नेताओं की हताशा है और अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ ने तो इसे ही लीड बनाया है. पर हिन्दी अखबारों की दुनिया अलग है. क्षमता, योग्यता और स्तर भी. सरकार भी अपने स्तर और शैली के अनुचार बचाव कर रही है. नजरंदाज नहीं कर रही. हिन्दी अखबारों के तेवर भी इस काम में सरकार की सहायता वाले हैं. लिहाजा, राहुल गांधी की प्रतिक्रिया, सरकार की कूटनीति गुजरात में जिनपिंग के साथ झूला झूलना, दिल्ली में गले लगना और चीन में घुटने टेक देना रही है. चीन के खिलाफ मोदी एक शब्द भी नहीं बोलते - का जवाब देना जरूरी है. 
अखबारों में नहीं छपे तो जवाब देने का क्या फायदा? इसलिए, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि इस मामले में मूल रूप से जवाहर लाल नेहरू दोषी है जिन्होंने सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की बजाय चीन का पक्ष लिया था. केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है, चीन ने 2009, 2016, 2017 व 2019 में भी मसूद के मामले में बाधा डाली थी. 2009 में तो केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. तब राहुल गांधी ने इस विषय पर कोई बयान दिया था या ट्वीट किया था? मुझे लगता है कि अजहर के मामले में सुरक्षा परिषद में जो हुआ वह हो चुका. अब जो अगला कदम हो सकता है, होगा. तब तक इस बयानबाजी का कोई मतलब नहीं है. खासकर जब दूसरे कई मुद्दे हैं.  
इस माहौल में नवभारत टाइम्स ने पहले पन्ने पर लीड खबर छापी है, मसूद पर चीन की दीवार के खिलाफ बाईपास बनाएंगे. और इसका नतीजा है कि चीनी उत्पादों के बायकाट की मांग की जा रही है. मैं समझ रहा ता कि ऐसी मांग व्हाट्सऐप्प पर ही चल रही है पर नवभारत टाइम्स ने ही छापा है कि व्यापारियों की संस्था सीएआईटी ने अपील की है कि दुकानदार चीन का माल न बेचें. केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर, बाबा रामदेव ने कहा कि चीनी उत्पादों के बायकाट का समय आ गया है. केंद्रीय मंत्री के ऐसा कहने का क्या मतलब है? जब दुनिया को पता है कि दुकानदार खुद जाकर चीन से सामान नहीं लाता है. चीन से बड़े पैमाने पर उत्पाद नियमानुसार आयात होते हैं और कई लोगों से होता हुआ दुकानदार के पास पहंचता है. 
बेचने के लिए खरीदा गया सामान दुकानदार न बेचे तो अपने पास रख ले? इससे चीन को क्या फर्क पड़ेगा? उसका सामान तो चीन से रवाना होता है तभी बिक जाता है या खरीदकर ही मंगाया जाता है. ऐसे में अंतिम उपयोगकर्ता तक सामान पहुंचे या नहीं चीन को क्या फर्क पड़ना है. कायदे से आयात रोका जाना चाहिए औऱ यह काम मंत्री को करना है पर वो अपील कर रही हैं. अखबार में छप रहा है. मैं नहीं कहता यह खबर नहीं है. मंत्री ने कहा है तो खबर है ही पर ऐसी बिना सिर पैर की खबरें या बयान छपेंगे तो मंत्री भी चुनाव जीतने के लिए ऐसे ही बयान देंगे. वही हो रहा है. 
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