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बिहार में तो लड़ेंगी जातियां ही गिरमिटिया महोत्सव के रूप में मानेगा लोकरंग 2019 कूड़े के ढेर पर बैठी काशी ! अतिक्रमणकारी थे तो उन्हें मुआवजा क्यों
नक़ल का नारा ज्यादा दूर तक नहीं जाता

अंबरीश कुमार 

राजनीति में किसी नारे की नक़ल नहीं चल पाती है .वर्ना इंदिरा गांधी का नारा ' गरीबी हटाओ ' फिर चल जाता .पर किसी नेता ने यह दुस्साहस भी नहीं किया कि कोई नारा ही मार दिया जाए .पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नारे को राफेल सौदे में लगे भ्रष्टाचार के आरोप से बचने के लिए ढाल बनाने का भौंडा प्रयोग किया है .सभी को याद है , मै भी अन्ना वाला नारा .अन्ना का वह आंदोलन भी कारपोरेट अंदाज में चला था और मीडिया ने उसे लेकर माहौल भी ठीक से बनाया था .मै भी अन्ना वाले पोस्टर बैनर से लेकर टीशर्ट और बनियान तक आ गई थी .मीडिया भी लहालोट था कि आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ी जा रही है .उस आंदोलन ने ही मोदी को लाने में बड़ी भूमिका भी निभाई .
और अब जब मोदी राफेल सौदे को लेकर राहुल गांधी के निशाने पर आए तो फिर वही नारा कुछ बदल कर पेश कर दिया गया .जैसे पुरानी फिल्मों में विलेन को बचाने के लिए ठीक वैसी वेशभूषा पहन कर उसके साथी सामने आ जाते थे .राहुल गांधी ने सिर्फ मोदी के लिए कहा कि चौकीदार चोर है .उसने राफेल सौदे में अंबानी को फायदा पहुंचाया है .पर मोदी ने अब सबको चौकीदार बनाकर इस गड़बड़ घोटाले में अपने को बचाने का प्रयास किया है .पर यह नारा 'मैं भी चौकीदार ' चलेगा कितना यह समझना चाहिए .अपना मध्य वर्ग का समाज आज भी न सिर्फ छूत पात मानता है बल्कि समाज के कमजोर तबके से भेदभाव भी करता है .इस मामले में चौकीदार तो हाशिये के समाज के लोगों से निकल कर आता है .कभी देखा है कि ये चौकीदार जब महीने का पैसा लेने लोगों के घरों में जातें हैं तो कोई इनको बैठने के लिए न कुर्सी देता है न पानी के लिए पूछता है .उस समाज में मध्य वर्ग जिसके बेटे बेटी डाक्टर ,इंजीनियर से लेकर कलेक्टर कोतवाल बनने की कतार में लगे हों वह किस मुंह से कहेगा ' मैं भी चौकीदार हूं .'इसलिए न यह नारा मध्य वर्ग को लुभाने वाला है न ही आभिजात्य वर्ग को .दूसरे जब महिला पत्रकारों के शोषण के लिए बदनाम एमजे अकबर से लेकर भगोड़े नीरव मोदी भी चौकीदार बन जाएं तो इस नारे की हवा निकालनी तय हैं .चुनाव में हार जीत के और जो भी कारण हो पर इस नारे से भाजपा को कोई राजनैतिक फायदा नहीं होने जा रहा है .इसकी बानगी पहले ही दौर में मिल गई जब राजनाथ सिंह से लेकर सुषमा स्वराज तक ने इस चकल्लस वाले अभियान से अपने को दूर कर लिया .हो सकता बाद में दबाव पड़े तो वे भी जुड़ जाएं लेकिन उनका नजरिया तो सामने आ ही गया .दरअसल मोदी ने चुनाव अभियान की कमान पूरी तरह अपने हाथ में ही ले रखी है .वे ही नारा भी तय करते हैं और जुमला भी .जानकारों के मुताबिक ' मुमकिन है ...वाला भी जुमला भी उन्ही की इजाद था और अन्ना का नारा भी वे ही ले उड़े .
पर इस चक्कर में वे चौकीदार के साथ सारे आर्थिक भगोड़ों के साथ राफेल सौदे को भी जाने अंजाने चुनावी चर्चा में लें आए हैं .दरअसल सत्तारूढ़ दल जब भी विपक्ष पर बेवजह ज्यादा हमलावर हो जाता है तो कई बार उसका नतीजा भी उल्टा हो जाता है .दरअसल यह सब मार्केटिंग एजंसियों की रणनीति से निकला है .जब से राजनीति को कारपोरेट के इवेंट मैनेजरों ने चलाना शुरू किया है तब से यह गिरावट आई है .इसकी शुरुआत राजीव गांधी के समय में कांग्रेस ने की चुनाव प्रचार के लिए की थी .बोफोर्स  के आरोप के जवाब में कांग्रेस के विज्ञापन में विपक्ष को सांप गोजर जैसा बताया गया .रिडिफ्यूजन एड एजंसी ने बहुत ही नकारात्मक प्रचार वाले विज्ञापन अखबारों को जारी किये थे .इंडियन एक्सप्रेस में भी विज्ञापन आए और छपे भी .पर संपादक अरुण शौरी ने जनसत्ता के तत्कालीन कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोड़पकर से हर विज्ञापन के जवाब में कार्टून बनवाए जो प्रकशित हुए .इस विज्ञापन अभियान की हवा अकेले इंडियन एक्सप्रेस ने निकाल दी .दरअसल बहुत ज्यादा नकारात्मक प्रचार जब सत्ता पक्ष करता है तो उसकी प्रतिक्रिया भी होती है .आज भाजपा का आईटी सेल तो इस प्रकार का अभियान चला ही रहा था खुद मोदी उसी रास्ते पर चले गए .वे देश के प्रधानमंत्री हैं कोई बहुरुपिया नहीं जो कभी चाय वाला बन जाए तो कभी चौकीदार .क्या लोकसभा चुनाव को वे चकल्लस में बदलना चाहते हैं .वैसे भी वे भाषण देते समय जिस अंदाज में ताली बजाते हैं ,कमर मटकाते हैं ,आंख चमकाते हैं और विपक्ष की खिल्ली उड़ाते हैं वह कोई शोभनीय नहीं माना जाता है . आज तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए किसी ने भी इस अंदाज में चुनाव नहीं लड़ा .  
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  • भरत के बदले दागी,नहीं सहेगा बलिया बागी !
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  • अख़बारों की लीगल रिपोर्टिंग का यह हाल !
  • पश्चिम में तो गठबंधन भारी,भाजपा की राह मुश्किल
  • छतीसगढ़ में भाजपा का रास्ता आसान नहीं
  • अतिक्रमणकारी थे तो उन्हें मुआवजा क्यों
  • साहब की 'सुरुआत' तो फीकी फीकी रही
  • अडानी के सामने बघेल भी दंडवत !
  • कमलनाथ ने ही घेरा है दिग्विजय को ?
  • बनारस में कौन होगा विपक्ष का उम्मीदवार ?
  • कूड़े के ढेर पर बैठी काशी !
  • छतीसगढ़ में आक्रामक हुई भाजपा
  • बिहार में तो लड़ेंगी जातियां ही
  • गिरमिटिया महोत्सव के रूप में मानेगा लोकरंग 2019
  • भाजपा ने हारी हुई सीटें जदयू को दी
  • तो शत्रुघ्न सिन्हा अब कांग्रेस के साथ
  • प्रियंका गांधी से कौन डर रहा है ?
  • तो अब धरोहरों से मुक्त हुई भाजपा
  • विदेश में तो बज ही गया डंका
  • साढ़े तीन दर्जन दलों की नाव पर सवार हैं मोदी !
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