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प्रियंका गांधी से कौन डर रहा है ?

शंभूनाथ शुक्ल

नई दिल्ली .ग्राउंड जीरो पर अभी कुछ दिन पहले तक अपोजीशन साफ़ था, लाख प्रयास करने के बाद भी न तो राहुल गांधी पैठ बना पा रहे थे, न अखिलेश या मायावती. लेकिन अब हालात बदले हैं, तो इसके मूल में प्रियंका गांधी हैं. प्रियंका का राजनीति में आना कोई चौकाने वाली या अप्रत्याशित घटना नहीं थी. मगर सत्तारूढ़ दल भाजपा ने जिस तरह रिएक्ट किया उससे तो मेसेज यही जा रहा है कि भाजपा जिस डाल पर बैठी है, उसे ही काट रही है. भाजपा नेता प्रियंका गाँधी के बारे में अनर्गल टिप्पणियाँ कर रहे हैं. वे उन्हें “पप्पू की पप्पी” बताते हैं. एक ऐसी पोलेटिकल पार्टी, जो खुद को संस्कारी और संयमी बताते नहीं थकती, उसके ये अलफ़ाज़ उसे जनता की नज़रों के बीच से उतार रहे हैं. खासकर उत्तर प्रदेश में, जहाँ प्रियंका एक्टिव हैं. उत्तर प्रदेश में घर की बहू-बेटी के बारे में इस तरह की टिप्पणियाँ बर्दास्त नहीं की जातीं. यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश में बड़े-बड़े दस्यु सम्राट भी महिलाओं के लिए ओछी टिप्पणियाँ कभी नहीं करते रहे हैं. यही कारण उसी ग्राउंड जीरो पर प्रियंका का ग्राफ बढ़ा है, और मोदी एवं भाजपा जनता की नज़रों से उतरने लगे हैं.
हालांकि अभी भी सब कुछ कांग्रेस या दूसरी पोलेटिकल पार्टियों के लिए अनुकूल नहीं है, क्योंकि युवा वर्ग आज भी मोदी का दीवाना है. लेकिन नौकरीपेशा, किसान, मजदूर, व्यवसायी तथा उद्यमी मोदी सरकार की नीतियों से खिन्न है. वह अपनी खिन्नता भले ही खुलेआम ज़ाहिर नहीं करता हो, किंतु उसके दिमाग में यह बात पैठी हुई है कि मोदी को रिपीट नहीं होने देना. अलबत्ता युवा वर्ग मोदी के साथ है, यह मोदी की उपलब्धि है. प्रियंका गांधी सोबर हैं, बहुत संयम के साथ और मीठा बोलती हैं, यकीनन उनमें इंदिरा गांधी की परछाहीं देखी जा सकती है. पर मोदी जैसे नेता को हारने के लिए जो आक्रामकता एवं तेवर चाहिए, वे फिलहाल उनमें नहीं दीख रहे हैं. राहुल गांधी यह आक्रामकता दिखाते हैं, लेकिन जो निरंतरता चाहिए, वह उनमें नहीं है. अखिलेश यादव वाक्-पटु हैं, खिलंदड़ी हैं और मासूम भी किंतु वे भी आक्रामक नहीं हैं. जो मायावती आज से डेढ़ दशक पहले तक सिंहनी की तरह दहाड़ती थीं, वे भी ठंडी पड़ी हैं. ऐसे में भाजपा को भाजपा के नेता ही अपने अनर्गल बयानों से निपटा देंगे, इसमें शक नहीं. 
इसकी भी दो वज़हें हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की कार्य-शैली से स्वयं उनकी पार्टी के लोग आजिज़ हैं. इसलिए वह भी उन्हें हारने में सकारात्मक भूमिका विपक्ष के लिए अदा कर रहे हैं. यही कारण है, कि सोमवार को प्रयागराज से काशी तक प्रियंका गाँधी ने जब अपनी गंगा यात्रा शुरू की, तब उसमें कुछ भाजपाई भी दिखे. यह यात्रा निसंदेह एक ऐसा माहौल बनाएगी, जिससे भाजपा की मुश्किलें बढेंगी. प्रियंका गाँधी ने भाजपा को उसी के ट्रैक पर चलकर दबाने की कोशिश की है. और इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली है. बड़ी बात तो यह है कि प्रयागराज में युवाओं ने उनकी इस गंगा यात्रा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. भाजपा जिन हिंदू प्रतीकों का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करती रही है, प्रियंका ने उन्हीं प्रतीकों के प्रति अपनी आस्था और श्रद्धा व्यक्त की है. यह एक बड़ी जीत है, क्योंकि उन्होंने इन प्रतीकों को अपने प्रचार का आधार नहीं बनाया, बल्कि उन पर आस्था जतायी है. चाहे वह हनुमान मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करनी रही हो, या गंगा यात्रा. भाजपा पांच साल के अपने कार्यकाल में ‘नमामि गंगे’ का नाम तो लेती रही, लेकिन गंगा सफाई में कतई दिलचस्पी नहीं ली. अब प्रियंका ने यह यात्रा शुरू कर न सिर्फ अपनी धार्मिक पहचान बताई, बल्कि गंगा किनारे बसे मल्लाहों, मछुआरों, बुनकरों और किसान-मजदूरों के प्रति एकजुटता भी दिखाई. उन्हें प्रयागराज में हाथों-हाथ लिया गया. यह उनकी बहुत बड़ी जीत है.
प्रधानमंत्री खुद को चौकीदार बताते हैं, इस पर प्रियंका गांधी ने तंज़ कसा कि चौकीदार तो अमीरों के होते हैं. एक तरह से उन्होंने संकेत दिया कि प्रधानमंत्री इस गरीब देश की जनता की रखवाली नहीं कर रहे, बल्कि देश के अमीरों के धन की चौकीदारी कर रहे हैं. इससे भाजपा का यह चौकीदारी वाला दांव चित हो गया. प्रयागराज में प्रियंका गाँधी ने अत्यंत भावुक भाषण दिया. उन्होंने वहां स्थित आनंद भवन (मोतीलाल नेहरु का वह मकान जिसे उनकी पोती इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस को दान कर दिया था, और अब उसका नाम स्वराज भवन हो गया है) से एक ट्वीट कर कहा कि यहीं मेरी दादी इंदिरा गांधी का जन्म हुआ था. उन्होंने लिखा कि रात को सुलाते वक़्त दादी मुझे ‘जोन ऑफ़ आर्क’ की कहानी सुनाते हुए कहती थीं- निडर बनो, सब अच्छा होगा! उनकी यह मार्मिक अपील प्रयाग वासियों का दिल जीत ले गई. यूँ भी प्रियंका गाँधी जिस तरह तूफानी दौरा कर रही हैं, वह अप्रितम है. अब भले भाजपा अभी सबसे ऊपर बैठी हो, लेकिन उसकी जड़ों में पलीता लग रहा है. और वह इसे समझ नहीं पा रही है.
सत्य तो यह है कि भाजपा 2014 में भी वर्चुअल परसेप्शन के बूते आई थी. भाजपा की आईटी सेल ने फेसबुक के ज़रिये एक धारणा बना दी थी कि मनमोहन सरकार बेहद करप्ट और नाकारा है. यह कांग्रेस की धड़ेबाजी थी कि मनमोहन सरकार का बचाव उस वक़्त कांग्रेस के किसी दिग्गज ने नहीं किया, उलटे उन्हें डुबाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. नतीजा वही हुआ, जिसके आसार थे. जिन लोगों को यह भ्रम है कि 2014 में नरेंद्र मोदी की आंधी थी, वे मुँह धो रखें. मोदी सरकार ने पिछले पांच साल में जनहित का कोई काम नहीं किया, उलटे प्रधानमंत्री जी अपने पूरे कार्यकाल में यही बताते रहे कि कैसे कांग्रेस द्वारा चौपट कर दिए गए भारत का वे जीर्णोद्धार कर रहे हैं. लेकिन कहीं भी और किसी भी शक्ल में उनको यह प्रयास दिखा नहीं. अब युवा भले न इसे समझ पाए हों, लेकिन अधेड़ और बुजुर्ग समझ गए. शायद यही कारण है कि यह पहला चुनाव है, जब तीस के ऊपर का मतदाता बदलाव चाहता है और तीस के नीचे का यथास्थिति. 
आमतौर पर ऐसा होता नहीं है. बदलाव या क्रांति सदैव युवा वर्ग लाते हैं. लेकिन वर्चुअल मीडिया ने युवा वर्ग के सोचने-समझने की शक्ति क्षीण कर दी है. वह रात-दिन फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट’स एप्प आदि को अपने एंड्रायड फोन के ज़रिये खेलता रहता है. और यह अँधेरा एक पूरी पीढ़ी को सत्यानाशी बना रहा है. हारे-जीते कोई भी, लेकिन हमारी युवा पीढ़ी को इस पतन से निकालना होगा. ऐसे में प्रियंका गांधी का राजनीति में आगमन यह तो क्लीयर करता ही है, कि शायद वे युवा वर्ग को देश की अहम् समस्याओं से रू-ब-रू कराने में सफल रहेंगी. कांग्रेस यदि युवाओं को देश के किसान, मजदूर वर्ग की चिंताओं से जोड़ सकी और उन्हें उद्यमशील बनाने में सफल रही, तो यह उसकी बहुत बड़ी जीत होगी. शुक्र है, कि कांग्रेस के नेताओं को अब यह दिखने लगा है कि राजनीति लुटियन जोंस के बंगलों से नहीं ग्राउंड जीरो से की जाती है. राहुल गांधी पिछले 15 वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं, और प्रियंका गांधी भी अब मैदान में हैं. तब कोई शक नहीं करना चाहिए कि कांग्रेस देश को सक्षम विकल्प देने में काबिल नहीं है.
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