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अख़बारों की लीगल रिपोर्टिंग का यह हाल !

संजय कुमार सिंह 

अखबारों में अभी तक आप पढ़ चुके हैं कि समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस के चारो अभियुक्त बरी हो गए हैं. पंचकुला की स्पेशल राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) कोर्ट ने असीमानंद समेत चारों अभियुक्तों को बरी कर दिया है. इस मामले में लोकेश शर्मा, कमल चौहान और राजिंदर चौधरी अभियुक्त थे. पाकिस्तान ने समझौता ब्लास्ट के अभियुक्तों की रिहाई पर नाराजगी जताते हुए कहा था थी धमाके के 11 साल बाद सभी अभियुक्तों का बरी हो जाना साबित करता है कि भारतीय अदालतों की विश्वसनीयता कितनी कम है.
इस मामले में कुल आठ अभियुक्त थे, इनमें से एक की मौत हो चुकी है, जबकि तीन को भगोड़ा घोषित किया जा चुका है. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने लगाए आरोप को साबित नहीं कर सका और इस कारण सभी अभियुक्तों को बरी किया जा रहा है. इससे पहले, समझौता ब्लास्ट में अपने पिता को खोने वाली पाकिस्तानी महिला राहिला वकील ने इस केस में गवाही देने की अनुमति मांगी थी. पर उस याचिका को खारिज कर दिया गया था. ऐसे मामले में सभी अभियुक्तों की रिहाई पर भारतीय मीडिया में फॉलो अप नहीं के बराबर रहा है. 
इंटरनेट पर बीबीसी की एक खबर है. टाइम्स ऑफ इंडिया के हवाले से इसमें कहा गया है, यह पूछे जाने पर कि क्या अभियोजन पक्ष इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेगा, उन्होंने कहा, नहीं, सरकार को क्यों अपील करनी चाहिए? इसका कोई मतलब नहीं है. राजनाथ सिंह ने इस मामले में नए सिरे से जांच को भी ख़ारिज कर दिया. उन्होंने कहा, एनआईए ने इस मामले की जांच की. इसके बाद ही उसने आरोप पत्र दाखिल किया. अब जबकि कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुना दिया है, उस पर भरोसा किया जाना चाहिए.
केंद्रीय गृहमंत्री के इस एलान के बाद अब फैसले की कॉपी आई है. इंडियन एक्सप्रेस ने आज इसे पहले पन्ने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया है। इस खबर का शीर्षक हिन्दी में लिखा जाए तो कुछ इस प्रकार होगा, सर्वश्रेष्ठ सबूत रोक लिए गए : समझौता मामले के जज ने एनआईए की निन्दा की. सोफी अहसान ने पंचकूला डेटलाइन की इस खबर के मुताबिक एनआईए जज ने फैसले में लिखा है कि वे ऐसा (अभियुक्तों को बरी करना) बेहद दुख और तकलीफ के साथ कर रहे हैं क्योंकि हिंसा की एक कार्यरतापूर्ण कार्रवाई में सजा नहीं हो पा रही है. 160 पन्ने का यह आदेश गुरूवार को जारी हुआ. फैसला 20 मार्च को सुनाया गया था. 
खबर के मुताबिक एनआईए जज जगदीप सिंह ने कहा कि इस मामले में अभियोजन ने सर्वश्रेष्ठ सबूत को रोक लिया और इसे रिकार्ड पर नहीं लाया गया. उन्होंने यह भी लिखा है कि कुछ स्वतंत्र गवाहों ने जब अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया तो उनसे जिरह नई हुई ही और ना उन्हें मुकरा हुआ गवाह (होसटाइल) घोषित करने की मांग की गई. ऐसे में केंद्रीय गृहमंत्री का पहले ही यह कह देना कि फैसले पर भरोसा करना चाहिए, और सरकार इस फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं देगी अधिकारियों के लिए संदेश है. खासकर ऐसे मामले में. मीडिया में इसका फॉलो अप नहीं आया तो कारण समझना मुश्किल नहीं है.   
इंडियन एक्सप्रेस की यह खबर एक्सक्लूसिव है. अमूमन ऐसी खबरें दूसरे अखबारों में नहीं होती हैं. इसलिए मैंने गूगल करके देखा. एक खबर जनसत्ता की है जो इंडियन एक्सप्रेस की खबर का ही अनुवाद है और सुबह 8:54 पर पोस्ट की गई है. सुबह सवा दस तक 413 बार शेयर की जा चुकी थी. दूसरी खबर नवभारत टाइम्स इंडिया टाइम्स की है. शीर्षक है, समझौता ब्लास्ट: स्पेशल कोर्ट के जज बोले, सबूतों के अभाव में गुनहगारों को नहीं मिल पाई सजा. अदालती फैसले की रिपोर्टिंग से जुड़े लोग जानते हैं कि पूरा विस्तृत लिखित फैसला बाद में आता है और लोगों को पता होगा कि फैसला वीरवार को आने वाला था. अगर असीमानंद समेत सभी अभियुक्तों को बरी किए जाने को मीडिया ने गंभीरता से लिया होता तो और अखबारों में आज खबर हो सकती थी. पर मुमकिन है राजथान सिंह का इशारा काम कर गया हो. 
18 फ़रवरी 2007 को भारत-पाकिस्तान के बीच हफ़्ते में दो दिन चलने वाली ट्रेन संख्या 4001 अप अटारी (समझौता) एक्सप्रेस में दो आईईडी धमाके हुए थे जिसमें 68 लोगों की मौत हो गई थी. यह हादसा रात 12 बजे के करीब दिल्ली से कोई 80 किलोमीटर दूर पानीपत के दिवाना रेलवे स्टेशन के पास हुआ. ट्रेन अटारी जा रही थी जो कि भारतीय हिस्से का आख़िरी रेलवे स्टेशन है. धमाकों की वजह से ट्रेन में आग लग गई और इसमें महिलाओं और बच्चों समेत कुल 68 लोगों की मौत हो गई जबकि 12 लोग घायल हुए थे.
 
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