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छतीसगढ़ में भाजपा का रास्ता आसान नहीं

 अनिल पुरोहित

लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों की घोषणा के बाद छत्तीसगढ़ के राजनीतिक परिदृश्य में जिस रोमांचक मुकाबले की उम्मीद की जा रही थी, वह अब परवान चढ़ती नहीं दिख रही है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि न तो भाजपा इन चेहरों के साथ अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखा रही है और न ही कांग्रेस के पास कोई वजह रह गई है कि वह पिछले विधानसभा चुनाव की जीत के जलवे पर कायम रह सके. वैसे भी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस को अपने राजनीतिक अस्तित्व के ऐतिहासिक संकट की आंशकाओं से घिरा बताया जा रहा है, इसके चलते छत्तीसगढ़ में भी किसी भी बहुत बड़े चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद प्रेक्षकों को फिलहाल नजर नहीं आ रही है. लेकिन, कांग्रेस से कहीं ज्यादा कड़ी चुनौती भाजपा के सामने इसलिए है क्योंकि विधानसभा चुनाव की करारी हार के बाद भाजपा ने जिस दमखम के साथ अपने 10 सांसदों की टिकट काटकर जो राजनीतिक संदेश देना चाहा था, वह अब प्रत्याशी घोषित होने के बाद लोगों तक किस रूप में पहुंचा? यह सवाल भाजपा के रणनीतिकारों के लिए मंथन का बिंदु है. भाजपा की रणनीति कितनी सफल रही, यह तो चुनावी नतीजें ही बताएंगे पर अभी राजनीतिक प्रेक्षक इसे बहुत ज्यादा उत्साहजनक नहीं मान रहे हैं क्योंकि भाजपा ने जिस जोर-शोर से नये चेहरों का राग आलापा था वह अब कर्णप्रिय नहीं लग रहा. दरअसल, चुनाव के दौरान ही तमाम राजनीतिक दल गुटीय, जातीय और राजनीतिक समीकरणों में उलझ जाते हैं और यह प्रवृत्ति आगे चलकर किसी गंभीर राजनीतिक संकट की पटकथा ही लिखेगा. वैचारिक प्रतिबद्धता और सार्वजनिक जीवन में प्रमाणिकता पर अगर जातीय और दीगर राजनीतिक समीकरण ही भारी पड़ने हैं, तो फिर राजनीतिक परिदृष्य में बदलाव की बातें क्या खोखली साबित नहीं होगी? अपने ही फैसलों और मापदंडों पर यू-टर्न लेते राजनीतिक दल ऐसा करके क्या लोगों के विश्वास से खिलवाड़ नहीं कर रहे हैं? यह विसंगति जितनी कांग्रेस में नजर आई उतनी ही भाजपा भी इन्हीं विसंगतियों के फे्रम में जड़ी हुई दिख रही है और इसी लिए कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही प्रदर्शन दोहराने के लिए जूझ रही है जिसका लब्बो-लुआब फिलहाल तो यही है कि कांग्रेस और भाजपा बराबरी के मुकाबले में हांफती नजर आ रही है. एक राज्य का दर्जा पाने के बाद छत्तीसगढ़ का यह पहला चुनाव होगा जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और भाजपा के सामने अपना प्रदर्शन दुहराने की चुनौती है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश की 11 में से 10 सीटों पर कब्जा करके अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन किया. लेकिन तीन विधानसभा चुनाव और तीन लोकसभा चुनाव में अपना जबर्दस्त प्रदर्शन करने के बाद 2018 में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा को महज 15 सीटों पर समेट दिया. जाहिर है, कांग्रेस को अब 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने जबर्दस्त प्रदर्शन का यकीन हो गया है. इसलिए इस बार लोकसभा चुनाव की बिसात सजाते कांग्रेस और भाजपा के सूरमा काफी सम्हलकर चल रहे हैं. एक और राजनीतिक गठबंधन प्रदेश की सियासत में अपनी दखल का दम मारने की जी-तोड़ कोशिशों में जुटा है, पर जिस तरह इस गठबंधन के एक दल में भागमभाग और अफरातफरी मची है, तो कल्पना की जा सकती है जो चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही हांफने की नौबत में हैं, वे मैदान में महज अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और कुछेक वोटो का समीकरण प्रभावित करने के अलावा कोई बड़ा करतब क्या दिखा पाएंगे? पूर्व मूख्यमंत्री अजीत जोगी की जनता कांग्रेस (छत्तीसगढ़) और उप्र की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी के इस गठबंधन को 2018 के विस चुनाव में जो गति प्राप्त हुई है, उसके बाद भी इस गठबंधन को अपनी राजनीतिक ताकत बढने की उम्मीद पालने का अधिकार तो है. लेकिन इधर बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरह प्रदेश में लोकसभा प्रत्याशियों की घोषणा ही है, वह इस गठबंधन को वेंटिलेटर तक पहुंचा चुका है. अब देखना यह है कि गठबंधन की सांसें अब और कितनी बची हैं? और, ऐसे हालात में वह कितना दम मार पाएगा? यूं छत्तीसगढ़ की सियासी-बिसात पर कांग्रेस और भाजपा ही आमने-सामने होती हैं. विधानसभा चुनावों में भले ही कुछेक दल-उम्मीदवार अपने प्रदर्शन के बल पर सियासत के मैदान में बाजी पलटने का हुनर दिखा दें, पर बात जब लोकसभा की होती है, तब मुकाबले में भाजपा और कांग्रेस ही आमने-सामने होती है. जाहिर है, अगला लोकसभा चुनाव भी इस परंपरा से जरा भी अलग नहीं होगा. अब चूंकि आने वाला लोकसभा चुनाव बेहद अहम और निर्णायक माना जा रहा है, तब कांग्रेस और भाजपा के बीच सियासी जंग का अंदाज भी वैसा ही दिखना है. एक तरफ 2018  की हार से पस्त भाजपा है तो दूसरी तरफ 2018 की जीत से उत्साहित कांग्रेस है. भाजपा करारी हार से उबरकर अपना गढ़ बचाने की जद्दोजहद ‘मोदी सरकार फिर एक बार’ का नारा लेकर कर रही है तो कांग्रेस प्रदेश की सभी 11 सीटें जीत जाने के लिए अधीर दिख रही है. कांग्रेस के पास छत्तीसगढ़ में खोने के लिए वैसे  भी कुछ नहीं है, पर विधानसभा चुनाव के नतीजों ने अब उसको भी खोने-पाने की चिंता में डाल दिया है. विधानसभा का प्रदर्शन दुहराने की चुनौती से जूझती कांग्रेस भी इस बार कसौटी पर है. प्रदेश की सत्ता सम्हालते ही कर्जमाफी, धान की कीमत, बिजली बिल हाफ जैसे मुद्दों पर तुरत-फुरत निर्णय लिए ताकि कांग्रेस के पक्ष में लोकसभा चुनाव तक माहौल बना रहे. कोई 43 फीसदी वोट लेकर छत्तीसगढ़ की सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस के सामने फिलहाल कोई बड़ी चुनौती राज्य के स्तर पर भाजपा ने खड़ी भले नहीं की होगी, पर कांग्रेस के रणनीतिकार एकदम बेफिक्र हो गए हों, ऐसा नहीं है. विधानसभा चुनाव में 33 फीसदी वोट के साथ ले-लेकर विपक्षी दल बनी भाजपा ने अपने तेवर शुरू से ही दिखाने  शुरू कर दिए थे. भाजपा के तेवर देख मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने घपलों-घोटालों के पुराने मामलों तक पहुंचने में देर नहीं की और हर मामलों की फाइलें खुलवाकर उनकी जांच के लिए टीम बनानी शुरू की. अपने राजनीतिक विरोधियों को लोकसभा चुनाव तक हद में रखने की इस रणनीति में मुख्यमंत्री कांग्रेस को कितना लाभ पहुंचा पाएंगे, यह अभी कहा नहीं जा सकता. लेकिन भाजपा ने लगभग हर मुद्दे पर कांग्रेस और उसकी सरकार के फैसलों तथा राजनीतिक इरादों के मद्देनजर अपने हमले जारी रखकर यह तो जताने की कोशिश की कि कांग्रेस की राजनीतिक राह एकदम निरापद नहीं है. हालांकि भाजपा विस चुनाव की हार के बाद अब पस्त भले नहीं नजर आ रही हो, पर अंदरखाने जिस गुटीय अंतद्र्वंद्व से वह जूझ रही है, कार्यकर्ताओं के बीच उसका संदेश सकारात्मक तो नहीं ही जा रहा है. 
फिर उसे विधानसभा चुनावों में मिले लाखों वोटों का गड्ढा भी आने वाले चुनाव में पाटना है. इस राजनीतिक सच्चाई को उसे स्वीकारना ही होगा कि मत-प्रतिशत और जीत-हार के अंतर के मद्देनजर इस बार उसे काफी मशक्कत करनी है लेकिन विस चुनाव के बाद पार्टी नेताओं में आपसी रार के जो नजारे सामने आए, नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष के चयन में भाजपा नेताओं ने जिस तरह के गुटीय द्वंद्व का नजारा पेश किया, आरोप-प्रत्यारोप के जो तीर चले, उन सबको देखकर लग तो यही रहा था कि पार्टी नेतृत्व प्रदेश में लोकसभा चुनाव में कोई ऐतिहासिक कामयाबी हासिल करने की इच्छाशक्ति से शून्य होता जा रहा है. लेकिन समय के साथ हर प्रकार की नाराजगी और असंतोष की चिंगारियों पर राख जमती प्रतीत हो रही है. कर्जमाफी, धान की बढ़ी कीमतों के भुगतान में विलंब, शराबबंदी पर यू-टर्न, राजनीतिक प्रतिशोध, बेराजगारी भत्ता, सरकारी खजाने पर कर्ज के बढ़ते बोझ जैसे मुद्दों के साथ भाजपा फिर मैदान में है. 
भाजपा मान रही है कि किसानों, महिलाओं, युवाओं समेत सभी वर्गों  के साथ मौजूदा राज्य सरकार ने छलावा किया है, और इसकी कीमत उसे अगले लोकसभा चुनाव में चुकानी ही पड़ेगी. पर बावजूद इसके, पिछले विधानसभा चुनाव की इस सच्चाई का जमीनी मुकाबला भी करना है कि तीन लोकसभा क्षेत्रों में वह इस बार किसी विस सीट पर काबिज नहीं है. भाजपा को अब अगर कोई भरोसा है तो वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे का और कांग्रेस की चिंता राज्य सरकार के तीन महीने के कामकाज के असर को लेकर है. आयुष्मान योजना, सवर्ण आरक्षण, किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं और फैसलों को अधर में लटकाकर, या फिर उनके क्रियान्वयन रुचि नहीं लेकर प्रदेश सरकार ने आम लोगों व किसानों की परेशानी तो बढ़ाई है. इसका असर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की संभावनाओं को पलीता लगा दे, तो आश्चर्य का विषय नहीं होगा. इधर, पुलावामा आतंकी हमले और बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद केन्द्र की मोदी सरकार के सख्त फैसलों ने भाजपा को उत्साह से भर दिया है. चूंकि मतदान को अभी वक्त है और छत्तीसगढ़ की चुनावी बिसात पर कब कौन-सा मुद्दा और समीकरण भारी पड़ेगा, यह मतदान पूर्व के आखिरी घंटों तक ही पता चल पाता है, इसलिए कोई निर्णायक राय जताना जल्दबाजी तो होगी ही. खासकर तब, जब कांग्रेस और भाजपा तमाम कवायद करके भी प्रत्याशी चयन से उपजी नाराजगी को भी झेल रही है.
 
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